Kizhoor village yet to get its prominence: किज़ूर गांव को अभी तक प्रमुखता नहीं मिली है

Aditya Kushwaha
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Kizhoor village yet to get its prominence:
किज़ूर गांव को अभी तक प्रमुखता नहीं मिली है

Kizhoor village yet to get its prominence किज़ूर गांव के बारे में –

नमस्कार प्यारे दोस्तों स्वागत है आपका हमारे एक और बेहतरीन आर्टिकल में जाम बात करने जा रहे हैं किज़ूर गांव के बारे में अभी-अभी यह बात सबके समक्ष आ रही है कि की किज़ूर गांव को अभी तक प्रमुखता नहीं मिली है

आखिर ऐसा कैसे हुआ कि एक गांव जो कि भारत का हिस्सा होते हुए भी अभी भी उसे भारत में कोई खास दर्जा या प्रधानता नहीं मिली है चलिए एक-एक करके इसके सारे पहलुओं पर विचार करते हैं. यह बात अक्टूबर 18 1954 की है जब कीजूर में एक ऐतिहासिक जनमत संग्रह हुआ था जिसमें फ्रेंच ने यह फैसला लिया था कि वह पुडुचेरी, कराईकाल ,यानाम एवं माहे के क्षेत्रों को भारत के हवाले करेंगे.

किज़ूर गांव को क्यों नही मिला भारत में प्रधानता ?

Kizhoor village yet to get its prominence किज़ूर गांव जोकि मंगलम में एक विलेज है उसने भी बड़े ही शांतिपूर्वक तरीके से जनमत संग्रह में भाग लिया था और पुडुचेरी के भारत में सम्मिलित होने को पूर्ण रूप से समर्थन दिया था लेकिन अभी तक फिजूल गांव को उसका वर्चस्व नहीं प्रदान किया गया और ना ही उसे यूनियन टेरिटरी में स्थान दिया गया.

क्या है किज़ूर गांव का इतिहास ?

जबकि फ्रेंच ने यह निर्णय लिया कि अब वह पुडुचेरी पर अपना अधिकार खत्म कर देंगे यह बात 1947 के स्वतंत्रता के आसपास की है Tho और अक्टूबर 18 1954 में जो ऐतिहासिक जनमत संग्रह हुआ था

उसमें फ्रेंच ने यह निर्णय लिया था कि वह कराईकाल या नाम एवं महेश जैसे क्षेत्रों को भारत के हवाले कर देंगे और जिस पर वोटिंग हुआ जोकि नवंबर 1 को यह सारे क्षेत्र फ्रेंच के हवाले से निकलकर भारत के अधिकार में दिए गए .

हाउस के प्रतिनिधित्व एवं म्युनिसिपल काउंसिल जिन्होंने जनमत संग्रह में हिस्सा लिया था उनका बहुमत फैसला यह था कि इन चारों क्षेत्र को भारत में जोड़ दिया जाए

कैसे आया किज़ूर गांव अपने अस्तित्व में ?

16 अगस्त के अटूट योगदान को स्वतंत्रता के बाद पुडुचेरी की सरकार ने या फैसला लिया कि वह हर वर्ष इस दिन कोDe jure Transfer Day. के रूप में मनाया करेंगे
लेकिन अब कीजूर में एक छोटा सा सेट डाल दिया गया और वहां पर वह लोग रहने लगे जिन्होंने कीजूर के भारत राज्य में मिलने को लेकर वोटिंग किया था. सिर के अंदर पास पास घर थे छठ के ठीक सामने ही एक पोल खड़ा किया गया था

जिस पर एक झंडा लहरा रहा था 16 अगस्त को और एक बोर्ड भी लगा हुआ था जिस पर उन लोगों का नाम लिखा हुआ था जिन्होंने इस जनमत संग्रह में हिस्सा लिया था
जगह को केवल दो ही दिन याद रखा गया नवंबर 1 को और अगस्त 16 को बाकी तो इसे भूल ही गए हालांकि आगामी सरकार ने यह वादा किया कि वह कीजूर को यूनियन टेरिटरी कैलेंडर मार के रूप में स्थापित करवाएंगे लेकिन यहां पर ऐसा कुछ नहीं हुआ

यहां तक की इस जगह को प्रमोट करने के लिए भी कुछ ऐसा नहीं किया गया अगर ऐसा किया गया होता तो यंगर जेनरेशन इसके योगदान को समझने में समर्थ होते हैं खजूर के एक निवासी यस रविचंद्रन कहते हैं .

S Ramdas के विचार ?

इकोनॉमिक्स जोकि पॉलीटिशियन बन चुके हैं एम रामदास वह यह भी कहते हैं कि गवर्नमेंट ने इस गांव के ऊपर थोड़ा भी ध्यान नहीं दिया यहां तक कि वह यहां पर कभी फ्लैग लहराने भी नहीं आए और ना ही किसी समारोह पर वह यहां पर फ्लैग लहराने आते हैं

उन्होंने यह तक भी कहा कि यहां के चीफ मिनिस्टर ने यहां पर बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया और यह मॉन्यूमेंट्स जगह बहुत ही बुरे रूप में बदल गया.
गवर्नमेंट को इस बात पर खास ध्यान देना चाहिए कि किशोर पुडुचेरी की तरह ही एक महत्वपूर्ण हिस्सा है जिसके कंस्ट्रक्शन और मेंटेनेंस पर खासकर ध्यान देना परम आवश्यक है

क्या करना चाहिए भारत सरकार को इसपर ?

Mr. Ramadass, Director (in-charge) UGC-Human Resource Development Centre, Pondicherry University Panch, रामालिंगम-

मिस्टर रामदास ने यह भी कहा कि यूनियन गवर्नमेंट को इस जगह को यूनेस्को हेरिटेज साइट में भी स्थान प्रदान करने की कोशिश करनी चाहिए.

Kizhoor village yet to get its prominence

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